छत्तीसगढ़

ब्रेकिंग न्यूज बस्तर का पशु विभाग बीमार – कर्मचारियों की कमी और अधिकारियों की लापरवाही से पशु विभाग की स्थिति दयनीय, इलाज के लिए भटकने को मजबूर किसान….

जगदलपुर (प्रभात क्रांति)। बस्तर जिला ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में किसान आज भी कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं । खेती-किसानी से लेकर जोताई, ढुलाई और दैनिक कृषि कार्यों में गाय, बैल, भैंस और भैसा जैसे पशु किसानों की रीढ़ माने जाते हैं । इन्हीं पशुओं के सहारे किसान वर्षों से अपने परिवार का जीवन यापन करते आ रहे हैं । ऐसे में पशुओं का स्वस्थ रहना किसानों के लिए अत्यंत आवश्यक है ।

राज्य शासन द्वारा किसानों के पशुओं के उपचार के लिए पशु चिकित्सालयों की स्थापना की गई, ताकि बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में समय पर इलाज मिल सके । लेकिन बस्तर जिले में पशु चिकित्सा विभाग की हालत खुद बीमार और लाचार होती जा रही है । विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी और उच्च अधिकारियों की उदासीनता ने पूरी व्यवस्था को शून्य बना दिया है ।

जगदलपुर शहर के चांदनी चौक स्थित पशु विभाग मुख्यालय में पदस्थ संयुक्त संचालक डी.के. नेताम, जो वर्ष 2023 से पदस्थ हैं, उनके कार्यकाल में ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ पशु चिकित्सा सहायक, डॉक्टर और अन्य कर्मचारी ग्रामीण पशु चिकित्सालयों के बजाय मुख्यालय या प्रभावशाली नेताओं के निजी पशुओं की सेवा में लगाए गए हैं । इसके कारण ग्राम नानगुर सहित कई ग्रामीण और जनपद पंचायत क्षेत्रों में पशु चिकित्सालय लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं न डॉक्टर उपलब्ध हैं, न दवाइयां और न ही आपातकालीन सेवा ।

ग्रामीण क्षेत्रों में पशु बीमार पड़ने या घायल होने की स्थिति में किसानों को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है । कई बार समय पर उपचार न मिलने से पशुओं की मौत तक हो रही है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है । किसानों का कहना है कि पशु विभाग के अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी मुख्यालय तक सीमित हो गए हैं, जिससे जमीनी स्तर पर सेवाएं ठप पड़ गई हैं ।

ग्रामीण किसानों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित पशु चिकित्सालयों को तत्काल सक्रिय किया जाए, पशु चिकित्सकों और कर्मचारियों की नियमित तैनाती सुनिश्चित की जाए और पशु विभाग की निरंतर निगरानी की जाए, ताकि किसानों को समय पर अपने पशुओं का इलाज मिल सके।

यदि समय रहते पशु विभाग की इस बदहाल स्थिति में सुधार नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा ।

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