छत्तीसगढ़

कन्या पोटाकेबिन मे खिड़की का पल्ला गिरने से तीन साल के मासूम का टूटा पैर, 8 अक्टूबर से 31 अक्टूबर याने 24 दिन के बाद भी घायल बच्चे का सुध नहीं लेना केवल लापरवाही नहीं मानवता का हार है…

बीजापुर(प्रभात क्रांति)। यह घटना दिल दहला देने वाला है । नगर के हृदय स्थल में संचालित कन्या पोटाकेबिन से दर्दनाक घटना उभरकर सामने आया है न केवल दिल को झकझोर देती है बल्कि पोटाकेबिन की अव्यवस्था एवं लापरवाही तथा संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाते हैं । पोटाकेबिन जैसे सुरक्षित जगह में तीन साल का नन्हा-मुन्ना मासूम बच्चा का पैर खिड़की का पल्ला गिरने से टूट गया ।

 

खबर लिखे जाने 24 दिन बीतने के बाद भी राजीव गांधी शिक्षा मिशन अपने ही स्टाफ के घायल बच्चे का किसी ने कोई सुध नहीं लिया । उन्हें उनके हालत में छोड़ दिया गया । इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां पढ़ाई करने वाले छात्रों का सुरक्षा कितना महफूज होगा । यह घटना जिम्मेदारी पर कहीं प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं । मसलन ऐसे लापरवाही के चलते पोटा केबिनों में बच्चों के मौत होने के कई घटनाएं अखबारों के सुर्खियों में बने रहते हैं । जिस मासूम का पैर टूटा उनकी मां लक्ष्मी झाड़ी यही पोटा केबिन में अनुदेशक है । बावजूद उनका कोई पूछ-परख नहीं होना एक दुसरे के प्रति लगाव नहीं होने तथा गैर जिम्मेदारी को दर्शाता है ।

रोज़ाना के तरह उस दिन छोटा बेटा को न लेजाकर साथ में बड़ा बेटा रित्विक को साथ लेकर पोटा केबिन में पढ़ाई करने वाले छात्रों को पढ़ाने जाती अनुदेशक को क्या पता था कि खेलते कूदते मासूम बेटा पोटाकेबिन के स्टाफ रुम में खिड़की के पास होल को बंद करने के मंशा से बगैर किसी सपोर्ट के लापरवाही तरीके से खड़े रखे लोहे से निर्मित भारी भरकम खिड़की का पल्ला को पकड़ते ही पल्ला मासूम के उपर धड़ाम से गिरने से मौके पर ही बच्चें का पैर टूट गया । सुरक्षा के दृष्टि से समय रहते पल्ला को वहां से हटा दिया जाता तो बच्चें का पैर टूटने से बच जाता । सोचने वाली बात है कि घायल बच्चे के जगह पोटा केबिन में पढ़ाई करने वालें कोई छात्रा के साथ यही घटना होता तो क्या उसे उनके ही हालत में शासन-प्रशासन राजीव गांधी शिक्षा मिशन के जिम्मेदारों के द्वारा छोड़ दिया जाता । हालांकि ऐसे परिस्थिति में घायल बच्चे का मदद करना और परिजनों का ढाढस बंधाया जाना हर इंसान का कर्तव्य व नैतिक जिम्मेदारी हैं ।

लेकिन 8/10/25 शाम से जिला अस्पताल में भर्ती दर्द से परेशान घायल मासूम बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में जिम्मेदार नुमाइंदों ने सुध नहीं लेना ऐसा प्रतीत हो रहा है यह केवल लापरवाही नहीं मानवता का हार है बल्कि पोटा केबिन की व्यवस्था का कमजोरी का उजागर करता है । घटना 08 अक्टूबर 2025 दोपहर 1.30 बजे का है । हैरान करने वाली बात है कि पोटा केबिन का निरीक्षण करने पहुंचे कथित नोडल अधिकारी के आंखों के सामने यह घटना घटी । रोते हुए मासूम के व्यथा को देख मानवता के नाते अस्पताल तक छोड़ने में उनका दिल नहीं पसीजा । उल्टे मां को जल्दी अस्पताल पहुंचाने का नसीहत देकर गंतव्य के ओर लौट गए । रोते बिलखती बच्चे की मां घटना के संदर्भ में बच्चे के पिता को फ़ोन करके बताई ।

घबराएं पिता पोटा केबिन पहुंचने के बाद पता चला की वहीं की स्टाफ अनुदेशक लता मामडीकर घायल बच्चे को स्कूटी से अस्पताल लेकर पहुंचे । यहां जांच के बाद एक्सरे रिपोर्ट में पता चला मासूम बच्चे का पैर कमर और घुटने के बीच पूरी तरह टूट गया । दो भागों में विभाजित हो गया यह दृश्य को देख मां-बाप का रो-रोकर बूरा हाल । बेहतर उपचार के लिए दूसरे दिन 09 अक्टूबर 2025 को तेलंगाना भद्राचलम जागृति हॉस्पिटल ले गए ।

उपर वाले का शुक्र करो की पल्ला मासूम के सिर पर गिरा नही गिरने से निश्चित तौर पर जान-माल का नुक़सान होता खिड़की टूटा हुआ है ये बात सबको पता है वहां की अधीक्षिका विजय लक्ष्मी वैध का सबसे बड़ा लापरवाही है समय से पहले खिड़की को मरम्मत करते तो ये घटना नही होता रित्विक झाड़ी का पैर ठीक रहता अब बच्चे का जिम्मेदारी का कारण सिर्फ और सिर्फ वहां की अधीक्षिका विजय लक्ष्मी वैध है एक बड़ा हादसा टाल गया । लेकिन अनावश्यक वजन दार एवं अनुपयोगी चीजों को बड़े छोटे बच्चे घूमने-फिरने के जगह में न रखें ताकि हाथ-पैर टूटने तथा जान-माल नुकसान जैसे घटना होने से बच सके । पोटा केबिन में ऐसे लापरवाही को सुधारात्मक कदम उठाने की बेहद जरूरत है । इस घटना के संदर्भ जवाबदेह अधिकारी के असहज तर्क को उल्लेख करना लाजिमी होगा ।

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