कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर में एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित…


जगदलपुर(प्रभात क्रांति)। दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि विज्ञान केंद्र, जगदलपुर एवं केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव केंद्र रायपुर कार्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया। कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर में कृषकों एवं कृषक प्रक्षेत्र में सीधे कार्य करने वाले मैदानी कार्यकर्ताओं को फसलों में कीट एवं रोगों के प्रभावी, सुरक्षित एवं पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन की तकनीकों से अवगत कराने के उद्देश्य से एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (IPM) विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संतोष नाग के मार्गदर्शन में किया गया।
कार्यक्रम के आरंभ में कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर के प्रभारी वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. राहुल साहू ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम में विभिन्न विभागों से ऐसे प्रशिक्षणार्थियों को शामिल किया गया है, जो सीधे कृषक प्रक्षेत्र एवं किसानों के साथ कार्य करते हैं। इसका उद्देश्य कीट एवं रोग प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकों का व्यापक स्तर पर प्रसार करना तथा अधिक से अधिक कृषक समूहों को इन तकनीकों का लाभ पहुंचाना है। कीट वैज्ञानिक धर्मपाल केरकेटटा ने बताया कि समन्वित कृषि प्रणाली अर्थात कई विभिन्न विधियों से कीट का प्रबंधन करने से कीटों का प्रभावी रूप से नियंत्रण तो होता ही है, साथ कृषकों द्वारा रसायन का कम उपयोग होने से कृषि की लागत को भी कम किया जा सकता है। इससे पर्यावरण प्रदूषण कम होने के साथ साथ पर्यावरण का संरक्षण होता है।
कार्यक्रम में केंद्रीय एकीकृत नशीजीव प्रबंधन केंद्र से आए डॉ. आशीष जायसवाल, डॉ. वरुणेश कुमार एवं श्री के. एल. मीणा की उपस्थिति रही, जिनके द्वारा प्रशिक्षण के दौरान फसलों में कीट एवं रोगों की पहचान, उनके जीवन-चक्र, प्रकोप की परिस्थितियों तथा समेकित प्रबंधन के विभिन्न उपायों पर विस्तृत जानकारी दी गई। कीट प्रबंधन के लिए लाइट ट्रैप, फेरोमोन ट्रैप तथा विभिन्न रंगों के स्टिकी ट्रैप के उपयोग की जानकारी दी गई। पीला स्टिकी ट्रैप मुख्य रूप से रस चूसक कीटों जैसे माहू, सफेद मक्खी एवं लीफ माइनर की निगरानी एवं प्रबंधन में उपयोगी बताया गया। इसी प्रकार नीला स्टिकी ट्रैप विशेष रूप से थ्रिप्स जैसे छोटे उड़ने वाले कीटों की निगरानी में उपयोगी है। सफेद स्टिकी ट्रैप सहित अन्य रंगीन ट्रैपों के माध्यम से विभिन्न कीटों की निगरानी, पहचान एवं उनकी संख्या के आधार पर समय पर प्रबंधन करने की तकनीक समझाई गई।
प्रशिक्षार्थियों को फेरोमोन ट्रैप के माध्यम से विशेष रूप से नर कीटों की निगरानी एवं सामूहिक फँसाव की तकनीक तथा लाइट ट्रैप के माध्यम से रात्रिचर कीटों की निगरानी एवं प्रबंधन के बारे में जानकारी दी गई। इस दौरान यह भी बताया गया कि ट्रैप का उपयोग केवल कीट नियंत्रण के लिए ही नहीं, बल्कि खेत में कीटों की उपस्थिति एवं प्रकोप की प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करने के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिससे आवश्यकता के अनुसार समय पर नियंत्रण उपाय अपनाए जा सकें।
जैविक कीट एवं रोग प्रबंधन के अंतर्गत विभिन्न लाभदायक सूक्ष्मजीवों के उपयोग के बारे में भी जानकारी दी गई। कीट प्रबंधन में बेसिलस थुरिंजिएन्सिस (Bt), ब्यूवेरिया बैसियाना, मेटाराइजियम एनीसोप्लिए तथा लेकैनिसिलियम/वर्टिसिलियम आधारित जैव-एजेंटों के उपयोग एवं उनकी कार्यप्रणाली के बारे में बताया गया। वहीं फसल रोगों के जैविक प्रबंधन में ट्राइकोडर्मा जैसे लाभदायक सूक्ष्मजीवों की भूमिका एवं उपयोग की जानकारी दी गई। जैविक एजेंटों का उपयोग अनुशंसित मात्रा एवं सही समय पर करने तथा रासायनिक कीटनाशकों के अनावश्यक एवं अंधाधुंध प्रयोग से बचने पर जोर दिया गया।
प्रशिक्षण के दौरान एकीकृत कीट प्रबंधन की विभिन्न विधियों जैसे कर्षण पद्धति, फसल चक्रण, जैविक नियंत्रण, यांत्रिक नियंत्रण, भौतिक नियंत्रण एवं आवश्यकता आधारित रासायनिक नियंत्रण के बारे में विस्तार से समझाया गया। खेत की नियमित निगरानी, संक्रमित पौधों एवं कीटग्रस्त भागों को हटाना, खरपतवार नियंत्रण, उचित फसल दूरी, समय पर बुवाई तथा संतुलित पोषण को भी कीट एवं रोग प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया। बीज उपचार का प्रायोगिक प्रशिक्षण भी दिया गया
कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर की कार्यक्रम सहायक श्रीमती श्वेता मंडल श्रीवास्तव द्वारा विभिन्न फसलों में होने वाले प्रमुख रोगों, उनके लक्षणों की पहचान तथा रोगों के प्रभावी प्रबंधन के उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। उन्होंने फसल में रोग के प्रारंभिक लक्षणों की पहचान कर समय पर प्रबंधन उपाय अपनाने तथा रोगग्रस्त पौधों एवं खेत की नियमित निगरानी के महत्व को रेखांकित किया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर के वैज्ञानिक डॉ. वेंकटेश्वर जल्लारफ, डॉ. नीलम बंजारे, डॉ. सुन्ना दीप्ति, डॉ. कोमल गुप्ता एवं इंजी. कमल ध्रुव, श्री दिनेश ध्रुव सहित कृषि विभाग, जगदलपुर से 10 कृषि अधिकारी, उद्यानिकी विभाग से 10 उद्यानिकी अधिकारी, बस्तर सेवक मंडल एवं सेबा से 20 फील्ड कार्यकर्ता तथा किसान एवं अन्य कृषक-फील्ड से जुड़े प्रतिभागियों सहित कुल 65 प्रशिक्षणार्थियों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि फसलों में कीट एवं रोगों का प्रबंधन केवल रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर न रहकर निवारक, जैविक, यांत्रिक, भौतिक एवं आवश्यकता आधारित रासायनिक उपायों के समन्वित प्रयोग से किया जाना चाहिए। इससे उत्पादन लागत को नियंत्रित करने, कीटनाशकों के अनावश्यक उपयोग को कम करने, पर्यावरण एवं लाभदायक जीवों की सुरक्षा करने तथा सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने में सहायता मिलेगी। कृषि विज्ञान केन्द्र, बस्तर, जगदलपुर द्वारा आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषकों तक वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक कृषि तकनीकों के प्रभावी प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा।




