75 दिनों का बस्तर दशहरा निर्विघ्न संपन्न, जोगी उठाई और राष्ट्रपति के कार्यक्रम को लेकर फैली भ्रांतियों पर सांसद महेश कश्यप ने दी सफाई…

जगदलपुर (प्रभात क्रांति)। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा इस वर्ष भी अपनी लगभग 650 वर्षों पुरानी परंपरा, आस्था और विधि-विधान के साथ निर्विघ्न संपन्न हुआ। 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक पर्व का शुभारंभ 12 अगस्त को पाट जात्रा के प्रथम विधान के साथ संपन्न होते हुए डेरी गड़ाई से लेकर माता की ढोली विदाई के साथ पर्व का समापन हुआ।
इस दौरान मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरीन, बस्तर राजपरिवार, देवी-देवताओं, पुजारियों, कर्मचारियों और आमजन की सहभागिता रही। इस वर्ष अबूझमाड़ सहित दूरस्थ और पूर्व में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के देवी-देवताओं की भी भागीदारी देखने को मिली।
बस्तर सांसद महेश कश्यप ने दशहरा पसरा गुड़ी में तहसीलदार जगदलपुर और मुरिया मांझी-चालकी की उपस्थिति में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पर्व के विभिन्न विधानों और उनसे जुड़े विवादों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने आयोजन के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर सभी समाजों, मांझी-चालकी, देवी-देवताओं के प्रतिनिधियों, समिति के सदस्यों और आमजन को बधाई एवं धन्यवाद दिया। सांसद ने कहा कि बस्तर दशहरा किसी राजनीतिक दल, परिवार या व्यक्ति का आयोजन नहीं, बल्कि पूरे बस्तर की साझा विरासत और दंतेश्वरी माई की सेवा-आराधना का पर्व है। लगभग 650 वर्षों से अलग-अलग समाज अपने पूर्वजों की परंपरा और आस्था के अनुसार इसमें सौंपे गए दायित्वों का निर्वहन करते आ रहे हैं।
जोगी उठाई को लेकर फैली खबरों पर जताई नाराजगी
सांसद महेश कश्यप ने सोशल मीडिया पर जोगी उठाई की रस्म को लेकर प्रसारित खबरों पर आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि जोगी बिठाई की रस्म नवरात्रि के दूसरे दिन होती है और मावली माता की डोली के मावली परघाव के दिन ही विधिवत जोगी उठाई की परंपरा पूरी की जाती है। इसके बाद संबंधित मांझी एवं अन्य लोग अपने गांव की पूजा-पद्धति के अनुसार चढ़ावे और फूलों की सामग्री का विसर्जन करने के लिए वापस लौटते हैं। सांसद के अनुसार, दशहरा समिति के सचिव और मांझी से मिली जानकारी के मुताबिक संबंधित लोगों को विधि-विधान और सम्मानपूर्वक विदाई दी गई तथा उन्हें निर्धारित सम्मान भी प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि जोगी को जबरन उठाकर भगाने की खबर भ्रामक थी और इससे आमजन में गलत संदेश गया। उन्होंने इस तरह की खबरों को लेकर दुख व्यक्त किया।
राष्ट्रपति के सामने प्रतीकात्मक विधानों की व्यवस्था पर भी दी जानकारी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के बस्तर प्रवास और मुरिया दरबार में सहभागिता को लेकर उठे सवालों पर सांसद ने बताया कि राष्ट्रपति केवल मुरिया दरबार के विधान में शामिल हुई थीं, क्योंकि उस समय तक दशहरा के अधिकांश पारंपरिक विधान संपन्न हो चुके थे। सभी मूल विधानों को राष्ट्रपति के सामने दोहराना संभव नहीं था, इसलिए लालबाग मैदान में उनके अवलोकन के लिए प्रतीकात्मक व्यवस्था की गई थी। वहां अलग-अलग विधानों के चित्र, जानकारी और प्रतीकात्मक रूप से संबंधित पात्रों को प्रस्तुत किया गया था। इसी क्रम में काछन देवी के रूप में एक बालिका को भी खड़ा किया गया था। सांसद ने कहा कि राष्ट्रपति से विशेष रूप से किसी को मिलाने का कोई उद्देश्य नहीं था, बल्कि यह व्यवस्था दशहरा के विभिन्न विधानों की जानकारी देने के लिए की गई थी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आंगा देव या दंतेश्वरी माई के मूल छत्र को प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित किया जाता है, उसी तरह यहां भी मूल परंपरा के सम्मान को ध्यान में रखते हुए प्रतीकात्मक प्रस्तुति की गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे नकली काछन देवी से जोड़कर प्रचारित करना उचित नहीं है।
रथ निर्माण और परंपरा से जुड़े लोगों को लेकर भी रखी बात
रथ निर्माण के दौरान प्लास्टिक के फूल लगाए जाने को लेकर उठे सवालों पर सांसद ने बताया कि सजावट के उद्देश्य से कुछ स्थानों पर प्लास्टिक के फूल लगाए गए थे, जबकि जहां वास्तविक फूल-मालाओं की आवश्यकता थी, वहां उनकी व्यवस्था की गई थी। रथ निर्माण से जुड़े लोगों को लेकर उन्होंने कहा कि उनसे बातचीत हुई है और उन्होंने भी किसी के द्वारा भगाए जाने की बात से इनकार किया है। सांसद के अनुसार, राष्ट्रपति के आगमन को देखते हुए प्रोटोकॉल के तहत रथ निर्माण का कार्य पूरा होने के बाद संबंधित लोगों को सम्मानपूर्वक रहने और आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि दशहरा से जुड़े सभी समाजों और परंपरागत जिम्मेदार लोगों का सम्मान बनाए रखना आवश्यक है।
सांसद महेश कश्यप ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि यहां के समाजों की आस्था, एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। सदियों से लोग बिना किसी स्वार्थ के श्रद्धा और विश्वास के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि आयोजन में कहीं कोई कमी या त्रुटि दिखाई देती है तो संबंधित लोगों को आयोजकों के सामने अपनी बात रखनी चाहिए, ताकि उसका समाधान किया जा सके। लेकिन बिना पूरी जानकारी के सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरें प्रसारित करने से बस्तर की छवि प्रभावित होती है। उन्होंने सभी से अपील की कि बस्तर दशहरा जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक आयोजन को राजनीति से अलग रखते हुए इसकी परंपरा, मर्यादा और गरिमा बनाए रखने में सहयोग करें।




