छत्तीसगढ़

बस्तर में आंखों की दो गंभीर बीमारियां बन रहीं दृष्टिहीनता का कारण, समय पर इलाज से बच सकती है रोशनी

जगदलपुर(प्रभात क्रांति)। बस्तर संभाग के एकमात्र मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल डिमरापाल में आंखों की दो गंभीर बीमारियां—कोर्निया अल्सर (Corneal Ulcer) और यूवाइटिस (Uveitis)—तेजी से लोगों की दृष्टि को प्रभावित कर रही हैं। मेडिकल कॉलेज के नेत्र विभाग में दो मेडिकल छात्रों द्वारा किए गए शोध में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। शोध के अनुसार इन बीमारियों के सैकड़ों मरीज उपचार के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं और समय पर इलाज नहीं मिलने पर दृष्टि हानि का खतरा बढ़ जाता है।

यूवाइटिस के मामलों में महिलाओं की संख्या अधिक

शोधकर्ता डॉ. श्रुति कंवर ने बताया कि यूवाइटिस के मरीजों में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक पाई गई है। यूवाइटिस आंख के अंदर स्थित यूविया परत में होने वाली सूजन है, जो संक्रमण, चोट या शरीर की अन्य बीमारियों से जुड़ी हो सकती है।

इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में आंखों में दर्द, रोशनी से परेशानी, धुंधला दिखाई देना तथा दृष्टि कमजोर होना शामिल है। शोध के दौरान बस्तर क्षेत्र में यूवाइटिस के 103 मरीज पाए गए, जिनमें अधिकांश महिलाएं थीं। विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं के शरीर की संरचना और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े कारणों के चलते 30 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में यह बीमारी अधिक देखी जाती है।

डॉ. कंवर ने बताया कि समय पर जांच और उपचार नहीं होने पर यह बीमारी स्थायी दृष्टिहीनता का कारण बन सकती है। कई मामलों में दवा का पूरा कोर्स नहीं लेने पर बीमारी दोबारा लौटने की संभावना भी बनी रहती है।

खेती-किसानी के दौरान चोट बन रही कोर्निया अल्सर की वजह

शोधकर्ता डॉ. विनीत कौशिक ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-किसानी और जंगल आधारित कार्यों के दौरान आंखों में लगने वाली चोटें कोर्निया अल्सर का प्रमुख कारण बन रही हैं। धान की बालियां, लकड़ी की टहनियां, घास-फूस और अन्य वन उत्पादों के संपर्क में आने से आंखों में चोट लग जाती है, जो बाद में संक्रमण का रूप लेकर कोर्निया अल्सर में बदल जाती है।

शुरुआती लक्षणों में आंख लाल होना, दर्द होना, पानी आना और धुंधला दिखाई देना शामिल हैं। अधिकांश लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती है।

शोध में 85 मरीजों को शामिल किया गया था। इनमें से 7 दिनों के भीतर इलाज कराने वाले लगभग 60 प्रतिशत मरीजों की दृष्टि वापस लौट आई, जबकि 30 प्रतिशत मरीजों की दृष्टि आंशिक रूप से प्रभावित हुई। वहीं 5 से 10 प्रतिशत मरीजों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उनकी दृष्टि पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच गई।

झाड़-फूंक और घरेलू उपचार बढ़ा रहे खतरा

नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. छाया शोरी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोग आंखों की समस्या होने पर पहले घरेलू नुस्खों, झाड़-फूंक या बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं का उपयोग करते हैं। कई मामलों में आंखों में तेल, जड़ी-बूटी या अन्य पदार्थ डाल दिए जाते हैं, जिससे संक्रमण और अधिक गंभीर हो जाता है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि आंखों में चोट लगने, दर्द होने या धुंधला दिखाई देने जैसी किसी भी समस्या को हल्के में न लें और तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें। शुरुआती चरण में उपचार मिलने पर कोर्निया अल्सर और यूवाइटिस दोनों का सफल इलाज संभव है, लेकिन देरी होने पर ऑपरेशन या जटिल उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है तथा कई बार दृष्टि वापस लाना संभव नहीं हो पाता।

डॉक्टरों की सलाह

  • खेती या जंगल में काम करते समय सुरक्षात्मक चश्मे का उपयोग करें।
  • आंख में चोट लगने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के कोई आई ड्रॉप या दवा का उपयोग न करें।
  • घरेलू उपचार और झाड़-फूंक से बचें।
  • आंख लाल होने, दर्द या धुंधलापन महसूस होने पर तुरंत जांच कराएं।

डिमरापाल अस्पताल में किए गए इस शोध से स्पष्ट हुआ है कि बस्तर में कोर्निया अल्सर और यूवाइटिस केवल सामान्य आंखों की बीमारियां नहीं हैं, बल्कि दृष्टिहीनता का बड़ा कारण बन सकती हैं। जागरूकता, समय पर जांच और सही उपचार ही आंखों की रोशनी बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।

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