छत्तीसगढ़

संविधान की कलम पत्रकार संघ के सचिव किशोर कुमार रामटेके के नेतृत्व में किरंदुल में शहीदों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि, 14 फरवरी को बदला काला दिन देशभक्ति के उजाले में… देखें वीडियो 

दंतेवाड़ा(प्रभात क्रांति) । दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल में 14 फरवरी 2026 को एक ऐतिहासिक और हृदयस्पर्शी कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें देश के शहीदों को याद करते हुए देशभक्ति की भावना को नई ऊर्जा प्रदान की गई। संविधान की कलम पत्रकार संघ के सचिव किशोर कुमार रामटेके ने इस पूरे आयोजन की कमान संभाली और इसे एक सशक्त संदेश देने वाले अवसर में बदल दिया।

यह दिन पूरे देश में पुलवामा आतंकी हमले की काली याद के रूप में “काला दिवस” के नाम से जाना जाता है, जहां शहीदों की कुर्बानी को याद कर दुख व्यक्त किया जाता है। लेकिन किरंदुल के इस कार्यक्रम ने इस दिन को पूरी तरह से उलट दिया। किशोर कुमार रामटेके दिलीप सींग विक्रम नाहक सुखदेव पोयाम रिया झाड़ी और उनके साथी सदस्यों ने इसे शहीदों की वीरता, बलिदान और देशप्रेम का उत्सव बनाने का फैसला किया। उनका स्पष्ट संदेश था – देशभक्ति किसी एक या दो विशेष दिनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह हर दिन, हर पल का हिस्सा होना चाहिए।

कार्यक्रम की शुरुआत ही बेहद भावुक रही। अर्चना बघेल द्वारा गाया गया प्रसिद्ध गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनके जरा याद करो क़ुरबानी” सुनते ही पूरा माहौल गमगीन हो गया। शहीद जवानों की छायाचित्रों पर फूल चढ़ाए गए, मोमबत्तियां जलाई गईं और मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कई लोगों की आंखें नम हो गईं, कुछ ने भावुक होकर आंसू पोछे। यह पल इतना मार्मिक था कि उपस्थित हर व्यक्ति के दिल में देश के प्रति गहरा सम्मान और कृतज्ञता की भावना जागृत हो गई।

संविधान की कलम पत्रकार संघ के सचिव किशोर कुमार रामटेके ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, “पत्रकारिता सिर्फ खबरें दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का भी सशक्त जरिया है। हमने इस दिन को चुनकर यह दिखाना चाहा कि शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ नहीं गई। उनकी याद में हम सबको देशभक्ति की राह पर चलना चाहिए।” उन्होंने जोर दिया कि 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) और 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) के अलावा भी देशभक्ति दिखानी चाहिए – रोजमर्रा की जिंदगी में, छोटे-छोटे कार्यों में।

इस अवसर पर कुंवाकोंडा क्षेत्र के 10 शहीद परिवारों को विशेष सम्मानित किया गया। इन परिवारों के सदस्यों को मंच पर बुलाकर फूल-मालाएं पहनाई गईं, स्मृति चिन्ह दिए गए और उनके परिजनों की भावनाओं का सम्मान किया गया। यह सम्मान न केवल शहीदों के बलिदान को याद करने का माध्यम था, बल्कि उनके परिवारों को यह एहसास दिलाने का भी प्रयास था कि पूरा समाज उनके साथ खड़ा है।

कार्यक्रम की खास बात स्कूली बच्चों की भागीदारी थी। किरंदुल के 13 विभिन्न स्कूलों से कुल 156 बच्चे शामिल हुए। इन बच्चों ने 17 अलग-अलग देशभक्ति गीतों पर मनमोहक नृत्य और गायन प्रस्तुत किए। छोटे-छोटे बच्चे जब जोशीले अंदाज में “वंदे मातरम”, “सारे जहाँ से अच्छा”, “हम होंगे कामयाब” जैसे गीत गाते और थिरकते नजर आए, तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा। बच्चों के चेहरों पर उत्साह और आंखों में देशप्रेम की चमक देखकर हर कोई गदगद हो गया। यह देखकर स्पष्ट था कि नई पीढ़ी में देशभक्ति की जड़ें मजबूत हो रही हैं।

संविधान की कलम पत्रकार संघ के अन्य सदस्य दिलीप सिंह विक्रम नाहक और सुखदेव पोयाम ने भी सक्रिय रूप से आयोजन में योगदान दिया। उन्होंने लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कार्यक्रम को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
यह कार्यक्रम नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में एक नया संदेश लेकर आया – जहां अक्सर हिंसा और भय की खबरें आती हैं, वहां देशभक्ति, एकता और शांति का संदेश फैलाना। किशोर कुमार रामटेके जैसे समर्पित कार्यकर्ता ऐसे प्रयासों से समाज में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं। उनका मानना है कि पत्रकारिता के माध्यम से समाज को प्रेरित करना और देशभक्ति की भावना को मजबूत करना उनका कर्तव्य है।

किरंदुल के लिए 14 फरवरी अब सिर्फ एक तारीख नहीं रहा – यह एक प्रेरणा बन गया है। जहां पहले काला दिन माना जाता था, वहां अब देशभक्ति का उजाला फैल रहा है। ऐसे आयोजन भविष्य में भी जारी रहेंगे, ताकि हर नागरिक के दिल में शहीदों की याद और देश के प्रति प्रेम हमेशा जिंदा रहे।

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