छत्तीसगढ़

दलपत सागर के लिए ₹50 लाख CSR से, लेकिन नगरनार और प्रभावित गांवों के लिए NMDC की तिजोरी बंद क्यों? — संतोष सेठिया

सांसद महेश कश्यप और विधायक किरण देव बताएं—आखिर नगरनार के ग्रामीणों का कसूर क्या है?

जगदलपुर (प्रभात क्रांति)।  नगरनार स्टील प्लांट द्वारा जगदलपुर के ऐतिहासिक दलपत सागर के साफ-सफाई एवं कायाकल्प के लिए NMDC के CSR मद से ₹50 लाख की राशि दिया जाना स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इसके साथ एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा होता है—जब NMDC दलपत सागर के लिए CSR मद से राशि दे सकती है, तो नगरनार और आसपास के उन प्रभावित गांवों के विकास के लिए पर्याप्त CSR राशि क्यों नहीं दी जा रही है, जिनके बीच यह विशाल सरकारी उद्योग स्थापित हुआ है?

नगरनार और आसपास के ग्रामीण वर्षों से प्लांट के कारण बढ़ती धूल, धुएं, प्रदूषण, भारी वाहनों की आवाजाही और अन्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। प्रभावित किसान और ग्रामीण विकास की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन उनके हिस्से में विकास के बजाय उपेक्षा क्यों आ रही है?

प्रभावित ग्राम पंचायतों के साथ हुए MOU का क्या हुआ?

प्रभावित ग्राम पंचायतों के साथ हुए MOU के तहत ग्राम पंचायतों के विकास के लिए एक निश्चित राशि प्रदान की जानी थी। पूर्व की कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इसी व्यवस्था के तहत प्रत्येक प्रभावित ग्राम पंचायत को ₹20 लाख की राशि प्रदान की जा रही थी।

लेकिन आज सवाल यह है कि जब MOU के तहत प्रभावित ग्राम पंचायतों को राशि देने की व्यवस्था थी और पूर्व में ₹20 लाख की राशि प्रदान भी की जा रही थी, तो वर्तमान सरकार में यह राशि क्यों बंद कर दी गई?

क्या प्रभावित ग्राम पंचायतों के विकास का अधिकार अब सरकार की प्राथमिकता नहीं रहा?

सरकार और प्रशासन स्पष्ट करें कि MOU के तहत तय राशि का भुगतान अब क्यों नहीं किया जा रहा है और इसे पुनः शुरू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?

बस्तर के मेले-मड़ई के लिए मिलने वाली सहायता भी बंद क्यों?

बस्तर की पहचान और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मेले-मड़ई हैं। पूर्व में बस्तर के विभिन्न मेले-मड़ई के आयोजन के लिए भी आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाता था, लेकिन अब यह सहायता भी बंद है।

एक ओर सरकार बस्तर की संस्कृति और परंपरा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर मेले-मड़ई जैसे पारंपरिक आयोजनों के लिए मिलने वाली सहायता क्यों बंद कर दी गई?

यह केवल राशि का विषय नहीं है, बल्कि बस्तर की संस्कृति, परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल है।

खेतों में आ रहा काला पानी, प्रभावित किसानों को मुआवजा कब?

नागरनार क्षेत्र में प्रदूषण और औद्योगिक गतिविधियों से प्रभावित किसानों की समस्याएं भी गंभीर हैं। खेतों में काला पानी आने की शिकायतों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

पूर्व में इस समस्या से प्रभावित किसानों को मुआवजा दिए जाने की बात हुई थी, लेकिन कई प्रभावित किसानों को आज तक उनका मुआवजा नहीं मिला है।

सरकार और प्रशासन स्पष्ट करें—

– किसानों के खेतों में काला पानी आने की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?

– प्रभावित किसानों के लंबित मुआवजे का भुगतान कब होगा?

– किसानों की फसल और जमीन को होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?

सांसद और विधायक से 6 सीधे सवाल

1. सांसद महेश कश्यप बताएं—नागरनार और आसपास के प्रभावित गांवों के लिए NMDC से पर्याप्त CSR राशि दिलाने तथा प्रभावित ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने अब तक क्या ठोस पहल की?

2. विधायक किरण देव बताएं—अपने ही विधानसभा क्षेत्र में प्लांट के आसपास के ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर उन्होंने सरकार और NMDC प्रबंधन के सामने कितनी मजबूती से आवाज उठाई?

3. प्रभावित ग्राम पंचायतों के साथ हुए MOU के तहत मिलने वाली ₹20 लाख प्रति ग्राम पंचायत की राशि पूर्व में दी जा रही थी, तो वर्तमान सरकार में यह राशि क्यों बंद है? इसे पुनः शुरू कराने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने क्या प्रयास किया?

4. जिन किसानों के खेतों में काला पानी आने की शिकायतें हैं और जिनका मुआवजा आज तक लंबित है, उनके लिए सांसद और विधायक ने क्या कार्रवाई करवाई?

5. प्लांट के आसपास रहने वाले लोग प्रदूषण, धूल और धुएं की समस्या झेल रहे हैं, तो उनके स्वास्थ्य और पर्यावरण की जिम्मेदारी कौन लेगा?

6. जब केंद्र और छत्तीसगढ़ दोनों जगह भाजपा की सरकार है और NMDC केंद्र सरकार के अधीन है, तो फिर नागरनार के प्रभावित ग्रामीणों के विकास और उनके अधिकारों में यह अड़चन आखिर किसकी है?

CSR राशि का इस्तेमाल जनता के लिए या सरकार की वाहवाही के लिए?

एक और बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार को अपने आयोजनों और कार्यक्रमों के लिए धन की आवश्यकता होती है, तो CSR मद की राशि के उपयोग को लेकर सवाल क्यों उठते हैं। रायपुर में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में CSR मद की राशि के उपयोग को लेकर भी सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों में CSR की राशि का उपयोग कर भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार और अपना नाम चमकाने में लगी हुई है। यदि CSR राशि का उद्देश्य जनता और प्रभावित क्षेत्रों के सामाजिक विकास के लिए है, तो फिर सरकारी आयोजनों और प्रचारात्मक गतिविधियों में इस राशि के उपयोग को लेकर सरकार को जनता के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

इतना ही नहीं, VIP मूवमेंट के दौरान होने वाले खर्च में भी CSR मद की राशि के उपयोग की बात सामने आती है। सवाल यह है कि जिस CSR राशि पर नागरनार और आसपास के प्रभावित गांवों का भी हक बनता है, उसका उपयोग सरकारी आयोजनों, प्रचार और VIP व्यवस्थाओं में क्यों किया जा रहा है?

नागरनार की जनता पूछ रही है—CSR की राशि जनता के विकास के लिए है या सरकार की वाहवाही और सरकारी आयोजनों का खर्च उठाने के लिए?

अगर CSR का पैसा सरकारी कार्यक्रमों और VIP व्यवस्थाओं में खर्च किया जा सकता है, तो फिर नागरनार के प्रभावित गांवों, किसानों, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल और पर्यावरण के लिए पर्याप्त CSR राशि देने में सरकार और NMDC को परेशानी क्यों है?

सरकार बताए—CSR की प्राथमिकता प्रभावित जनता है या सरकार का प्रचार?

यह कैसी “डबल इंजन” सरकार है?

आज केंद्र में भाजपा की सरकार है और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की सरकार है। बस्तर के सांसद महेश कश्यप और जगदलपुर विधायक किरण देव दोनों सत्तापक्ष से हैं।

इसके बावजूद नागरनार के प्रभावित ग्रामीण अपने हक, मुआवजे, बुनियादी सुविधाओं, विकास राशि और प्रदूषण से राहत के लिए भटक रहे हैं।

तो फिर यह कैसी “डबल इंजन” सरकार है?

इंजन दो हैं, लेकिन नागरनार के विकास की गाड़ी आखिर चल क्यों नहीं रही है?

क्या सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों का काम केवल चुनाव के समय जनता के बीच जाना है?

क्या ग्रामीणों की समस्याओं को सरकार और NMDC तक मजबूती से पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी नहीं है?

उद्योग नहीं, जनता की उपेक्षा के खिलाफ लड़ाई

नागरनार ब्लॉक कांग्रेस कमेटी स्पष्ट करना चाहती है कि हम उद्योग और विकास के विरोधी नहीं हैं। हमारा सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में इतना बड़ा सरकारी उद्योग स्थापित हुआ है, वहां रहने वाली जनता को भी विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल और पर्यावरण सुरक्षा का उचित अधिकार मिलना चाहिए।

NMDC एक सरकारी उपक्रम है और उसके CSR मद की राशि का उद्देश्य समाज और प्रभावित क्षेत्रों के विकास में योगदान देना है। इसलिए नागरनार और आसपास के प्रभावित गांवों की जनता का यह सवाल पूरी तरह जायज है कि जब दलपत सागर के लिए ₹50 लाख CSR मद से दिए जा सकते हैं, तो नगरनार और आसपास के प्रभावित गांवों के लिए पर्याप्त CSR राशि क्यों नहीं?

प्रभावित ग्राम पंचायतों को MOU के तहत मिलने वाली राशि क्यों बंद की गई?

प्रभावित किसानों का मुआवजा आज तक क्यों लंबित है?

बस्तर के मेले-मड़ई के लिए मिलने वाला सहयोग क्यों बंद किया गया?

इन सभी सवालों का जवाब सरकार, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को देना होगा।

मैं, संतोष सेठिया, ब्लॉक अध्यक्ष, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी नागरनार, सरकार, NMDC प्रबंधन, सांसद महेश कश्यप और विधायक किरण देव से मांग करता हूं कि नागरनार और आसपास के प्रभावित गांवों के विकास, CSR, MOU के तहत ग्राम पंचायतों की राशि, प्रदूषण नियंत्रण तथा किसानों के लंबित मुआवजे को लेकर तत्काल ठोस कार्रवाई की जाए।

यदि जल्द ही प्रभावित गांवों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो नागरनार ब्लॉक कांग्रेस कमेटी जनता को साथ लेकर सड़क पर उतरकर आंदोलन करेगी।

जरूरत पड़ी तो ढोल-नगाड़े बजाकर सांसद, विधायक और जिम्मेदार अधिकारियों को उनकी “कुंभकर्णी नींद” से जगाया जाएगा।

जनता के हक की लड़ाई में कांग्रेस पीछे नहीं हटेगी।

अब सवाल सिर्फ CSR का नहीं है—

सवाल नागरनार की जनता के अधिकार, किसानों के मुआवजे, प्रभावित ग्राम पंचायतों के हक और बस्तर के सम्मान का है।

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