छत्तीसगढ़

झीरम नरसंहार मामले में एनआईए कोर्ट का फैसला आधा-अधूरा न्याय है; बड़े षड्यंत्र और बड़े नक्सली की भूमिका का पर्दाफाश नहीं हुआ- विक्रम मंडावी

झीरम में भाजपा की भूमिका संदिग्ध, धरमलाल कौशिक के स्टे ने जांच रोकी, भाजपा झीरम का सच दबा रही है,  झीरम मामले में भाजपा की तत्कालीन सरकार शुरू से संदिग्ध रही है- विक्रम मंडावी 

बीजापुर (प्रभात क्रांति)। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्देशानुसार जिला कांग्रेस कमेटी, बीजापुर द्वारा जिला मुख्यालय बीजापुर में प्रेस वार्ता आयोजित की गई। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने कहा कि 23 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए बर्बर हमले में स्व. नंदकुमार पटेल, स्व. महेंद्र कर्मा, स्व. विद्याचरण शुक्ला और स्व. उदय मुदलियार सहित 32 नेताओं की हत्या हुई थी। इस मामले में आया फैसला आधा-अधूरा न्याय है। उन्होंने कहा हम न्यायालय के फैसले का आदर करते हैं, परंतु यह स्पष्ट है कि अदालत ने वही फैसला दिया है जो एनआईए ने माननीय न्यायालय के समक्ष तथ्य रखे थे। एनआईए की जांच शुरू से दिशाहीन रही है। एजेंसी ने घटना के राजनीतिक षड्यंत्र के पहलू की जांच ही नहीं की। प्रेस वार्ता में विधायक विक्रम मंडावी ने कहा कि जिन 10 लोगों को एनआईए ने गिरफ्तार किया और जिन्हें दोषी ठहराया गया है, वे छोटे नक्सली थे। इतनी बड़ी और संगठित घटना बड़े नक्सली नेतृत्व के बिना संभव नहीं थी। एनआईए ने बड़े नक्सली के नाम प्रारंभिक एफआईआर में शामिल किए थे, बाद में उन्हें हटा दिया गया।

प्रेस वार्ता में विक्रम मंडावी ने सवाल उठाते हुए कहा कि इस फैसले से घटना की साजिश का पर्दाफाश नहीं हुआ है। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा क्यों हटाई गई थी? यात्रा के मार्ग को किसने और क्यों बदलवाया था? हमले की योजना किसने बनाई थी? जब-जब बड़े नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, तब सरकार ने दावा किया कि वे झीरम हमले में शामिल थे। फिर एनआईए ने उनसे पूछताछ क्यों नहीं की?

घटना के प्रत्यक्षदर्शी, जो स्वयं घायल भी थे, उनमें से कितनों से एनआईए ने पूछताछ की? झीरम हमले के दौरान घायल और जीवित बचे पीड़ितों के बयान तक नहीं लिए गए। कई बार प्रभावित जांच एजेंसियों के समक्ष शपथ पत्र के साथ उपस्थित हुए, फिर भी उनके बयान शामिल नहीं किए गए। हत्याकांड के हफ्तों बाद भी शहीदों और घायलों के पर्स, फाइलें और महत्वपूर्ण दस्तावेज बिखरे पड़े रहे। किसी का भी मोबाइल जब्त नहीं किया गया।

विधायक विक्रम मंडावी ने आगे प्रश्न उठाया कि एनआईए ने छत्तीसगढ़ सरकार की पुलिस द्वारा गठित एसआईटी को जांच से क्यों रोका? एनआईए ने तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी और एडीजी (नक्सल) से कब पूछताछ की?

बड़े नक्सली के नाम क्यों हटाए गए?

प्रारंभिक एफआईआर में दो प्रमुख नक्सली नेता गणपति (मुपल्ला लक्ष्मण राव) और रमन्ना का नाम था। 21 मार्च 2014 को गणपति और रमन्ना सहित 26 फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे। फिर चार्जशीट से उनका नाम क्यों हटाया गया? अगस्त 2014 तक इनके नाम थे, लेकिन सितंबर 2014 की प्रारंभिक और अंतिम चार्जशीट से नाम हटा दिए गए। यह क्यों हुआ? एनआईए की प्रारंभिक जांच में देवा (बारसे सुक्का उर्फ देवा) का नाम झीरम में शामिल नक्सलियों में था। उन्हें वांछित घोषित किया गया था और ईनाम भी घोषित था। फिर उनसे पूछताछ क्यों नहीं हुई? उन्होंने आगे कहा एनआईए ने जिन 26 लोगों को नामजद कर फरार घोषित किया था, उनमें बसवाराजू, गणेश ऊइके, रूपेश उर्फ संजीव, सुरेन्द्र उर्फ रामचंद्र रेड्डी, जयदेव उर्फ बड़ा देव, सोनू उर्फ भूपति आदि के नाम थे। इनमें से कई ने आत्मसमर्पण किया है। एनआईए ने उनसे पूछताछ कब की? क्या एजेंसी ने उन्हें निर्दोष मान लिया है?

झीरम में शामिल सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ क्यों नहीं हुई?

विधायक विक्रम मंडावी ने कहा कि झीरम घाटी हत्याकांड में शामिल और एनआईए तथा पुलिस द्वारा वांछित/फरार घोषित कई प्रमुख नक्सलियों ने समय-समय पर आत्मसमर्पण किया है। इनमें प्रमुख हैं: 1- चैतू उर्फ श्याम दादा (DKSZC सदस्य) 25 लाख रुपये के ईनामी। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के वरिष्ठ सदस्य और झीरम हमले की साजिश तथा दरभा डिवीजन संचालन के मुख्य सूत्रधार माने जाते हैं। इन्होंने 9 अन्य कैडरों के साथ बस्तर पुलिस के समक्ष समर्पण किया। 2- रूपेश उर्फ मोल्ला राजिरड्डी (केंद्रीय समिति सदस्य/नक्सली कमांडर) सरेंडर के बाद सार्वजनिक रूप से कहा कि झीरम नरसंहार संगठन की बड़ी गलती और नीतिगत विफलता थी। 3- निर्मला उर्फ सुमित्रा (महिला कैडर) 20 लाख रुपये की ईनामी। हमले के दौरान अग्रिम मोर्चे और लॉजिस्टिक सपोर्ट में सक्रिय रहीं। इन्होंने बस्तर में सुरक्षा बलों के समक्ष समर्पण किया। 1 करोड़ रुपये के ईनामी भूपति उर्फ सोनू दादा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की उपस्थिति में गढ़चिरौली में समर्पण किया। केंद्रीय समिति सदस्य सुजाता ने सितंबर 2025 में तेलंगाना में समर्पण किया, जिन पर छत्तीसगढ़ ने 40 लाख और तेलंगाना ने 25 लाख रुपये का ईनाम घोषित किया था।

इन सबसे पूछताछ क्यों नहीं की गई? इन्हें अभियोजित क्यों नहीं किया गया?

विधायक विक्रम मंडावी ने कहा “भाजपा नहीं चाहती कि झीरम का सच सामने आए” विधायक विक्रम मंडावी ने आगे कहा कि “झीरम मामले में भाजपा की तत्कालीन सरकार शुरू से संदिग्ध रही है।” भाजपा ने जांच की दिशा भटकाने का हर संभव प्रयास किया।

तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष धर्मलाल कौशिक न्यायिक जांच आयोग के खिलाफ स्टे लेकर आए थे। कांग्रेस सरकार ने छत्तीसगढ़ पुलिस की एसआईटी गठित की तो एनआईए जांच रोकने के लिए स्टे लेकर आ गई। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस की एसआईटी को जांच के पक्ष में फैसला दिया, फिर भी ढाई वर्षों में विष्णुदेव साय सरकार ने जांच शुरू नहीं की।

उन्होंने कहा कि भाजपा नहीं चाहती कि झीरम का सच सामने आए। एनआईए की जांच और कार्यप्रणाली से भी यही सिद्ध होता है। घटना के समय भी सरकार और नक्सलियों के बीच साठ-गांठ के आरोप लगे थे। आज फैसला आने के बाद भी बड़े नक्सली को एनआईए ने बचाया है। यह सरकार, भारतीय जनता पार्टी और एनआईए का नक्सलियों से साठ-गांठ का स्पष्ट प्रमाण है।

कांग्रेस कमेटी शहीदों के परिजनों तथा घायल साथियों के साथ खड़ी है। हम मांग करते हैं कि झीरम नरसंहार के राजनीतिक षड्यंत्र, सुरक्षा हटाने, मार्ग बदलने और बड़े नक्सली नेतृत्व की भूमिका की स्वतंत्र, निष्पक्ष और संपूर्ण जांच हो। आधा-अधूरा न्याय स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रेस वार्ता में लालू राठौर, शंकर कुड़ियम, आर. वेणुगोपाल राव, प्रवीण डोंगरे, राजेश जैन, ज्योति कुमार और जितेंद्र हेमला सहित बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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