‘‘पूना मारगेमः पुनर्वास से पुनर्जीवन’’, बदलाव की नई शुरुआत, 36 ईनामी सहित 63 माओवादी कैडर मुख्यधारा में शामिल… देखें वीडियो


दंतेवाड़ा(प्रभात क्रांति) | छत्तीसगढ़ शासन की नक्सल पुनर्वास नीति के प्रभावी क्रियान्वयन एवं नक्सल मुक्त बस्तर के संकल्प को साकार करने की दिशा में दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा संचालित ‘‘पूना मारगेमः पुनर्वास से पुनर्जीवन’’ अभियान लगातार सकारात्मक परिणाम दे रहा है। इसी क्रम में आज 36 ईनामी सहित कुल 63 माओवादी कैडरों ने हिंसा का मार्ग छोड़ते हुए समाज की मुख्यधारा में लौटने का संकल्प लेकर आत्मसमर्पण किया।
आत्मसमर्पित माओवादी दरभा डिवीजन, दक्षिण बस्तर, पश्चिम बस्तर, माड़ एवं उड़ीसा राज्य में सक्रिय रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वालों में 18 महिला एवं 45 पुरुष माओवादी शामिल हैं। इन पर कुल ₹01 करोड़ 19 लाख 50 हजार की इनामी राशि घोषित थी, जिसमें ₹08 लाख, ₹05 लाख, ₹02 लाख, ₹01 लाख एवं ₹50 हजार के ईनामी माओवादी शामिल हैं।

यह आत्मसमर्पण डीआरजी कार्यालय दंतेवाड़ा में पुलिस उप महानिरीक्षक (परि.) सीआरपीएफ दंतेवाड़ा रेंज राकेश चौधरी, पुलिस अधीक्षक दंतेवाड़ा गौरव राय (भा.पु.से.), कमांडेंट 111वीं वाहिनी सीआरपीएफ गोपाल यादव, कमांडेंट 195वीं वाहिनी सीआरपीएफ अनिल कुमार सिंह, कमांडेंट 230वीं वाहिनी सीआरपीएफ अनिल कुमार प्रसाद, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रामकुमार बर्मन (रा.पु.से.) एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।
बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि
‘‘पूना मारगेम (पुनर्वास से पुनर्जीवन) बस्तर क्षेत्र में स्थायी शांति, सम्मान और समग्र विकास की दिशा में एक परिवर्तनकारी पहल बनकर उभर रहा है।’’
आत्मसमर्पित माओवादियों को छत्तीसगढ़ शासन की पुनर्वास नीति के तहत ₹50,000 की तात्कालिक सहायता राशि प्रदान की जाएगी। साथ ही उन्हें कौशल विकास प्रशिक्षण, कृषि भूमि एवं अन्य शासकीय सुविधाएं उपलब्ध कराकर सम्मानजनक जीवन की ओर अग्रसर किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार एवं छत्तीसगढ़ शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर पिछले 22 महीनों में दंतेवाड़ा जिले में 201 ईनामी सहित 572 से अधिक माओवादी समाज की मुख्यधारा में लौट चुके हैं। वहीं लोन वर्राटू अभियान के तहत अब तक 369 ईनामी सहित कुल 1224 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है।
दंतेवाड़ा पुलिस एवं जिला प्रशासन ने शेष माओवादियों से भी अपील की है कि वे हिंसा का मार्ग त्यागकर शांति, संवाद और पुनर्वास की राह अपनाएं तथा अपने परिवार, समाज और बस्तर के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में सहभागी बनें।
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