छत्तीसगढ़

माटी (आमा) त्यौहार के नाम पर राहगीरों से वसूली, साल में एक बार आने वाला पर्व, लेकिन अवैध उगाही से बिगड़ रही परंपरा की छवि….

जगदलपुर (प्रभात क्रांति) । बस्तर जिले में पारंपरिक त्योहारों की अपनी अलग पहचान है, जहां हर पर्व को ग्रामीण बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं । इन्हीं में से एक है पारंपरिक माटी त्यौहार (आमा त्यौहार), जिसे नया धान के बीज का पूजा कर हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । लेकिन अब यह पवित्र और साल में एक बार आने वाला त्योहार अपनी मूल भावना से भटकता नजर आ रहा है ।

परंपरागत रूप से इस त्योहार में पुजारी, गुनिया, सिरहा, मांझी, पटेल, कोटवार सहित ग्राम के प्रमुख लोग शामिल होकर धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ आयोजन करते थे । पहले एक गांव में एक ही स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से रास्ता रोककर श्रद्धा अनुसार धान या राशि ली जाती थी, जो परंपरा का हिस्सा माना जाता था ।
लेकिन वर्तमान स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है । अब त्योहार के नाम पर कई स्थानों पर छोटे-छोटे बच्चों और युवकों द्वारा सड़कों पर जगह-जगह नाका बनाकर राहगीरों को रोका जा रहा है और जब तक पैसा नहीं दिया जाता, उन्हें आगे नहीं जाने दिया जाता । इससे आम लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है ।

प्रभात क्रांति की टीम द्वारा बजावंड क्षेत्र के निरीक्षण में पाया गया कि पाईकपाल, बजावंड, तारापुर सहित कई गांवों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अवैध रूप से नाके बनाकर वाहनों को रोका जा रहा है । खासकर युवा वर्ग इस गतिविधि में अधिक सक्रिय नजर आ रहा है, जिससे त्योहार की गरिमा पर सवाल उठने लगे हैं ।

स्थिति चिंताजनक तब हो जाती है जब कुछ युवक इस दौरान नशे की हालत में राहगीरों से पैसे की मांग करते हैं और न देने पर दुव्र्ययवहार तक करते हैं । यह न केवल परंपरा के विरुद्ध है, बल्कि कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है ।

गौरतलब है कि बस्तर को देवी-देवताओं की भूमि के रूप में जाना जाता है, जहां सरकार भी देवगुड़ी निर्माण और धार्मिक गतिविधियों में सहयोग करती रही है । ऐसे में त्योहार के नाम पर इस प्रकार की अवैध उगाही पूरी तरह अनुचित और निंदनीय है ।

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस पर सरकार को स्पष्ट गाइडलाइन जारी करनी चाहिए, ताकि त्योहार अपनी पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया जा सके और आम नागरिकों को परेशानी न हो । साथ ही पुजारी, गुनिया, सिरहा, मांझी, पटेल और कोटवार जैसे पारंपरिक जिम्मेदार लोगों को इस आयोजन में प्रमुख भूमिका दी जानी चाहिए, ताकि अनुशासन बना रहे ।

जरूरत इस बात की है कि साल में एक बार आने वाले पवित्र पर्व को उसकी असली पहचान के साथ संरक्षित किया जाए, न कि इसे अवैध वसूली का माध्यम बनने दिया जाए ।

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