छत्तीसगढ़

“पनडुम पर राजनीति का आरोप: बस्तर की परंपरा को लेकर मूलनिवासी समाज नाराज़” – महेश स्वर्ण

जगदलपुर (प्रभात क्रांति) । बस्तर माटी पुत्र महेश स्वर्ण “एबोरिजिनल ट्राइब्स!” ने कहा है कि बस्तर में “पनडुम” के नाम पर जिस प्रकार शासन–प्रशासन द्वारा राजनीतिक स्वार्थ से मूलनिवासी समुदायों को बाँटने का प्रयास किया जा रहा है, वह अत्यंत चिंताजनक और अस्वीकार्य है। यह नीति बस्तर के शांतिप्रिय समाज के विरुद्ध “बांटो और राज करो” की खतरनाक परंपरा को जन्म दे रही है।

उन्होंने कहा कि “पनडुम” कोई शासकीय उत्सव या प्रचार का शब्द नहीं हैं

“पनडुम” बस्तर के आदिवासी–मूलनिवासी समाज की आस्था, विश्वास और प्रकृति से जुड़ा जीवन–विधान है। इसका आयोजन किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि गायता, पेरमा और बड्डे द्वारा चाँद–उदिया देखकर तय तिथि, दिन और समय पर होता है, जिसमें गाँव का हर व्यक्ति बिना भेदभाव सम्मिलित होता है।

धान की बुआई (बीजा पनडुम) से लेकर पहली फसल और वनोपज तक—

पनडुम सम्पन्न हुए बिना उस अन्न, फल या साग को ग्रहण नहीं किया जाता।

यह परंपरा आदिवासी मूलनिवासी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, रीति–रिवाज, रूढ़ी प्रथा और मान्यताओं से गहराई से जुड़ी है।

महेश स्वर्ण ने कहा कि जिस प्रकार “पनडुम” शब्द का शासकीय और अशासकीय कार्यक्रमों में हल्के और राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है, वह आदिवासी समाज की आस्था के साथ भद्दा मज़ाक है। यदि किसी अन्य धर्म या समुदाय के पवित्र शब्द के साथ ऐसा किया जाए, तो देशव्यापी विवाद खड़ा हो जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि आज केवल “पनडुम” ही नहीं, बल्कि 1910 के भूमकाल जैसे ऐतिहासिक संघर्षों और वीर पुरखों के साथ भी भेदभाव किया जा रहा है। कुछ समुदायों को विशेष रूप से सामने रखकर, अन्य मूलनिवासी समुदायों को अलग करने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे बस्तर के लोगों को आपस में विभाजित कर जल–जंगल–जमीन की लूट का रास्ता बनाया जा सके।

महेश स्वर्ण ने स्पष्ट कहा कि— बस्तर संभाग संविधान की पाँचवीं अनुसूची (अनुच्छेद 244(1)) के अंतर्गत संरक्षित क्षेत्र है और यहाँ पेसा कानून लागू है।

संविधान लागू होने के समय 1949 और 26 जनवरी 1950 में जिन जाति–समुदायों को आदिवासी जनजाति समुदाय के रूप में माना गया था, उन सभी को समान रूप से अनुसूचित जनजाति वर्ग में अधिसूचित किया जाना चाहिए। तभी बस्तर की रूढ़ी–प्रथा, परंपरा और धरोहर सुरक्षित रह सकेगी।

उन्होंने कहा कि बस्तर के मूल बीज—मूलनिवासी समाज— इस प्रकार की विभाजनकारी और अपमानजनक राजनीति को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button