619 वर्षों की आस्था का प्रतीक बना बस्तर का ऐतिहासिक गोंचा महापर्व, 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी के साथ निकली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा, नौ दिनों तक जनकपुरी में देंगे दर्शन…. देखें वीडियो


जगदलपुर (प्रभात क्रांति)। विश्व प्रसिद्ध बस्तर का ऐतिहासिक गोंचा महापर्व इस वर्ष श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक वैभव के साथ मनाया गया। करीब 619 वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा में इस बार पहली बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा प्रारंभ होने से पूर्व 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी दी गई। जैसे ही भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा अपने-अपने रथों पर विराजमान हुए, तुपकियों की गूंज और जय जगन्नाथ के उद्घोष से पूरा जगदलपुर भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो गया। हजारों श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनकर रथयात्रा में भाग लिया ।
वहीं रथयात्रा प्रारंभ होने से पूर्व भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं जगदलपुर नगर निगम के महापौर संजय पांडे के नेतृत्व में मंचीय कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में गोंचा महापर्व की ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को इस पर्व के महत्व से अवगत कराया गया। इसके पश्चात विधि-विधान एवं पूजा-अर्चना के साथ भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा का शुभारंभ हुआ, जिसमें हजारों श्रद्धालु जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ शामिल हुए।

बस्तर का गोंचा महापर्व ओडिशा के पुरी की रथयात्रा की परंपरा से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसकी अपनी विशिष्ट पहचान है। रथयात्रा के पूर्व भगवान का नेत्रोत्सव और राजपरिवार द्वारा ‘छेरा-पोहरा’ (चांदी के झाड़ू से मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई) की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में विराजमान होकर सिरहासार स्थित जनकपुरी के लिए प्रस्थान करते हैं। वहां तीनों विग्रह नौ दिनों तक भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसके बाद पारंपरिक विधि-विधान के साथ उनकी वापसी रथयात्रा निकाली जाती है। इस दौरान पूरे बस्तर में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
गोंचा महापर्व की सबसे अनूठी पहचान ‘तुपकी’ की परंपरा है, जो केवल बस्तर में ही देखने को मिलती है। पारंपरिक रूप से बांस से बनी तुपकी में मलकांगनी (पेंग) के बीज डालकर प्रतीकात्मक रूप से चलाया जाता है। लोकमान्यता है कि यह बीज औषधीय गुणों से भरपूर होता है और वर्षों से यह परंपरा सामाजिक सौहार्द, उत्सव और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रही है। इस वर्ष पहली बार 100 युवाओं द्वारा भगवान जगन्नाथ के समक्ष सामूहिक तुपकी सलामी देकर इस विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया गया।
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने कहा कि गोंचा महापर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष 100 तुपकियों की सामूहिक सलामी का उद्देश्य इस अद्वितीय परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाना है। उन्होंने सभी बस्तरवासियों से इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक इसकी परंपरा को जीवंत बनाए रखने का आह्वान किया।
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