करपावंड में 21 आदिवासी परिवारों के आशियाने पर संकट, नकटी गांव जैसी कार्रवाई की आशंका से ग्रामीणों में दहशत….. देखें वीडियो –


जगदलपुर(प्रभात क्रांति)। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के माना स्थित नकटी गांव में विस्थापन की कार्रवाई के बाद अब बस्तर जिले के करपावंड ग्राम पंचायत में भी ग्रामीणों के बीच वैसी ही आशंका गहराने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन द्वारा सीमांकन की कार्रवाई के बाद वर्षों से बसे 21 आदिवासी परिवारों के आशियाने पर संकट मंडरा रहा है। प्रभावित परिवारों का दावा है कि वे तीन पीढ़ियों से यहां निवास कर रहे हैं और अब अपने घर उजड़ने की आशंका से भयभीत हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो कई परिवार बेघर हो जाएंगे।
ग्रामीणों के अनुसार, हाल ही में प्रशासन द्वारा लगभग 10 एकड़ भूमि की नाप-जोख की गई। बताया जा रहा है कि उक्त भूमि का क्रय-विक्रय एक निजी व्यापारी के नाम पर हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन पर वे वर्षों से मकान बनाकर रह रहे हैं, उन्हें कभी यह जानकारी नहीं थी कि संबंधित भूमि किसी निजी व्यक्ति के स्वामित्व में है। कई परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी मिला है और वे लंबे समय से वहीं निवास कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि व्यापारी द्वारा नक्शा दिखाकर उनके निवास वाले क्षेत्र को भी अपनी भूमि बताया जा रहा है तथा खरीदी गई भूमि के साथ-साथ उनके मकानों वाली जमीन का भी सीमांकन किया जा रहा है। कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि उनके पास भूमि से संबंधित पट्टे हैं, लेकिन उन्हें अमान्य बताते हुए कार्रवाई की जा रही है।
पीड़ित महिलाओं ने बताया कि वे अपने बाप-दादा के समय से इस स्थान पर रह रही हैं और अब अचानक उन्हें घर खाली करने की आशंका सता रही है। घर उजड़ने के डर से सभी 21 परिवार एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे हैं। सीमांकन के दौरान हुए तनाव के बाद कुछ लोगों और अधिकारियों के बीच धक्का-मुक्की की घटना हुई, जिसके बाद प्रशासन ने 21 ग्रामीणों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी। इस कार्रवाई के बाद ग्रामीणों में और अधिक चिंता का माहौल बन गया है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में रायपुर के माना स्थित नकटी गांव में प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान 40 से अधिक मकान ढहाए जाने के बाद पूरे प्रदेश में विस्थापन का मुद्दा चर्चा में रहा। करपावंड के ग्रामीणों का कहना है कि वे भी ऐसी ही कार्रवाई की आशंका के साए में जीवन जी रहे हैं।
उनका कहना है कि वर्षों से बसे परिवारों के भविष्य को लेकर सरकार और प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेना चाहिए, ताकि विकास और मानवीय अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे। ग्रामीणों ने प्रशासन से संवाद के माध्यम से समाधान निकालने और किसी भी कार्रवाई से पहले प्रभावित परिवारों के हितों का ध्यान रखने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं ही आदिवासी समाज से आते हैं, ऐसे में उन्हें उम्मीद थी डलब इंजन कि सरकार आने से वर्षों से बसे आदिवासी परिवारों की समस्याओं का संवेदनशील समाधान निकाला जाएगा किन्तु उन्हें ही अपने घरों से बेघर किया जा रहा है ।
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