सरगी वनोपज की खरीद बंद, बिचौलियों के भरोसे ग्रामीण, औने-पौने दाम में खरीद से वन संग्राहकों को हो रहा भारी नुकसान….


जगदलपुर (प्रभात क्रांति)। बस्तर जिला में सर्वाधिक वन होने के कारण यहां विभिन्न प्रकार के तरह-तरह के औषधि एवं वनोपज पाए जाते हैं। बस्तर के अनेक आदिवासी परिवारों की आजीविका महुआ, तेंदूपत्ता, सरगी सहित अन्य लघु वनोपजों पर निर्भर है।
इसी तरह बस्तर जिला में सरगी झाड़ की विशेषता यह है कि सरगी झाड़ जिस जगह में है, वहां बस्तर की “काला मोती” कहे जाने वाले बोड़ा, छाती आदि की प्रचुरता से पाई जाती है, जो प्रकृति की अनमोल देन है। 
बस्तर जिले में प्रचुर मात्रा में मिलने वाली सरगी (सहजन बीज) जैसी महत्वपूर्ण वनोपज इन दिनों सरकारी उपेक्षा का शिकार होती नजर आ रही है। वर्तमान में वन विभाग एवं वनोपज समितियों द्वारा सरगी की खरीदी नहीं किए जाने से ग्रामीण और वन संग्राहक अपनी उपज बिचौलियों को औने-पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले सरगी की खरीदी की व्यवस्था होने से उन्हें उचित मूल्य मिल जाता था, लेकिन अब सरकारी खरीद बंद होने के कारण बिचौलिए इसका लाभ उठा रहे हैं। वे कम कीमत पर सरगी खरीदकर बाजार में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं, जबकि मेहनत करने वाले वन संग्राहकों और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित विभाग द्वारा इस वनोपज के संरक्षण, खरीदी और विपणन की प्रभावी व्यवस्था नहीं किए जाने से उन्हें हर वर्ष आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने शासन और वन विभाग से मांग की है कि सरगी वनोपज की शासकीय खरीदी शीघ्र शुरू की जाए ।




